रंग दे।।

तेरे कारोबार के बाज़ार में खरीदार बहुत है,
हमारी महफिलों में भी तेरे कद्रदान बहुत है।
तू उड़ा गुलाल और फिर मज़े देख,
रंगरेज़, तेरे रंग में रंगने के लिए लोग बेताब बहुत है।

पर किस रंग में रंगेगा तू मुझे??
फाल्गुन का केसरिया, या सावन का हरा,
कार्तिक का लाल, वा अगहन का सुनहरा?
या रंग खुसरो के क़व्वाली में फूलती सरसों के पीले वाला?

तू रंग सकता है मुझे, तेरे आंखों के कत्थई सा भी,
या तो उसपे सजे तेरे काज़ल के सुर्ख काले सा भी।
औलिया के दरगाह पे चढ़ती चादर सा रंग दे,
या रंग सकता है मुझे तो बसंती चोले सा भी।

माथे पे सजी तेरी बैंगनी बिंदी सा रंग दे,
तू मुझे नीला, नारंगी, जामुनी, गुलाबी और अपनी कई साड़ियों के कई रंग में रंग दे।

और गर हो नामंजूर ये सारे रंग मेरे तुझे,
तो रंगना तू मुझे श्वेत रंग में।

और श्वेत ना ही हो चांद वाला ना गुलाब वाला,
ना श्वेत शंख वाला ना ही मोती वाला,
ना श्वेत रण वाला ना ही हंस वाला

श्वेत हो तो सिर्फ पीर फकीर वाला,

क्योंकि तेरे रंग के कारोबार के खरीदार बहुत है,
पर हम खरीदें कैसे रंग तेरा 'सहर', तेरे लिए हम गरीब बहुत है।।

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