खुद को लखनऊ और तुमको पुरानी दिल्ली लिखूंगा।।

एक रात एक बात लिखूंगा
तुम्हें चांद खुद को चकोर लिखूंगा

वैसे मुझे दावतें बहुत पसंद है,
इसलिए लिखते लिखते मैं खुद को चार मीनार और तुमको अमीनाबाद लिखूंगा,
स्वाद तो खास निजामी भी है, मगर
जब लिखूंगा मैं लज़्ज़त,
खुद को लखनऊ और तुमको पुरानी दिल्ली लिखूंगा।

और जब लिख ही रहा हूं तो,
तो तुम्हारा मेरा साथ हर बार लिखूंगा।
साथ के जिसमें तुम्हे आता देख मैं शर्मा जाऊं, 
और मुझे आता देख तुम इठलाओ,
साथ जिसमें तुम्हारी गली के हर चक्कर पे, मैं भूलता जाऊं खुद का पता,
और जब लिखने की बात आएं 
तो मैं खुद को रांझा तुमको हीर लिखूंगा।

पर क्योंकि मैं लिख चुका हूं साथ अपना, 
तो फिर अब हम जुदा नहीं होंगे,
मैं रांझा, हीर के इंतजार में इश्क़ के सात पड़ाव पार नहीं करूंगा,
बस इजहार करूंगा और हीर मेरी होगी,
और जब फ़िर लिखना होगा, हमारे बारे में
तो मैं खुद को क़ैस और तुमको लैला लिखूंगा

पर जबकि लिख चुका हूं, मैं साथ तुम्हारा हमारा,
तो अब लैला, मौलवी को प्रेम और पूजा का अंतर नहीं समझा पाएगी,
शायरों के कई ग़ज़लें बेकार साबित होंगी,
मजनू, लैला की तुलना कुरान-ए-शरीफ़ की स्याही से नहीं करेगा,
और फिर एक रोज मैं लिखते - लिखते,
मैं खुद को पापा और तुम को मां लिखूंगा।

चाय के प्याले पे मां की होठों की लाली पे जैसा पापा आज भी दिल हार जाते है,
मैं भी कॉफी के मग पे तुम्हारे हाथ की मेंहदी के निशान से इश्क करूंगा
तुम जब - जब साड़ी पहनोगी, मैं तुम्हारे कदमों पे उसकी सिलवटें सवारूंगा,
तुम रूठ के मायके जाने की धमकी देना, मैं हर बार तुम्हे मना लूंगा,
फिर जब हम हो जायेंगे वृद्ध, 
मैं अपनी चश्मे के पीछे से तुम्हे नज़रे टेढ़ी करके देखूंगा, 
तुम अखबार में गुम मेरी मौजूदगी को नज़र अंदाज कर देना।

फिर अंत में एक आखिरी रात मैं एक बात लिखूंगा,
तुम्हें मेरा, और ख़ुद को तुम्हारा लिखूंगा।।

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