मैं तो नहीं चाहिए ना तुम्हे??

लोग पूछते है मुझसे, तुम्हारे जाने के बाद मैने क्या खोया है?
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मैने कुछ खोया तो नहीं, पर अब चांद मेरे लिए थोड़ा कम रोशन होता है,
महताब का नारंगी रंग असमान में कम खिलता है,
वो गुलाबी शामें मेरे शहर से नदारद है।

वैसे तो खोने को कई आंसू, कई लम्हे, कई ख्वाहिशें खो दी मैने,
पर ठंड आज भी उतनी ही शीतल है,
रात रानी तुम्हारी गली के नुक्कड़ पे आज भी उतना ही महकती है,
इन्द्रधनुष आज भी सप्तरंगी है।

वैसे बदली तो मेरी हसरतें भी नहीं है
आज भी चलती सड़क पे तुम्हारा हाथ थामे, पगडंडियों पे चलने का जी करता है,
मेरे जानेब तुम बैठो, तुम्हे हर वक़्त बाहों में भरने का जी करता है,
आज भी तुम्हारे बैगनी दुप्पटे में अपने गीले हाथ पोछने का जी करता है।

चाय में आज भी अदरक ज्यादा डालता हूं,
खीर अक़्सर फीकी खाता हूं
हर रात फ़लक पे चांद से तुम्हारी शिकायतें करता हूं
हर रोज, एक दफ़े, किसी और के रिश्ते में अपने गुमनाम रिश्ते का नाम ढूंढता हूं।

वैसे इतना भी कुछ नहीं खोया है मैंने,
मेरे चादर की सिलवटें आज भी पहचानती है मुझे,
मेरे घर के कोने में आज भी एक दो ज़ाले नजर आते है
कुछ पुरानी किताबों से आज भी पुराने बुक शेल्फ की महक आती है
मेरी पुरानी गुलाबी शर्ट पे एक बैगनी लिपस्टिक का निशान आज भी है,
कुछ पुराने सफ़्हे जो मैंने तुझे कभी पढ़ाए नहीं, आज भी दराजों में छीपे बैठे है।

पर याद आती है,
हर रोज के तेरे तारो से उलझती, झल्लाती इशारों की,
मेरे शेरों पे तेरे शर्माने की
मेरे शानो पे तेरे बेचैनी भरे हाथों की,
तेरे जुल्फों में लगे मोगरे, तेरे कानो पे सजे झुमके
और...,
और
याद आती है तेरे मेरे उन वादों की 
की जिनमें साथ ज़िंदगी थी हमारी।

वादे तो टूट गए, पर कुछ यादें छुट गई है
वो कत्थई दराज़ में एक पश्मीना भी है, 
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर बुना हुआ है उसपे,
उसमें तुम्हारी महक थोड़ी सिलती जा रही है।

वो पश्मीना तो नहीं चाहिए ना तुम्हे?
सच्ची, मैं तो नहीं चाहिए ना तुम्हे??

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