मेरी शव यात्रा।

सन्नाटा सा पसरा है चार दीवारों के अंदर,

इंतेज़ार करते करते निगाहे इस कदर थक चुकी है कि अब किसी भी आहट पे दरवाज़े की ओर नहीं बढ़ती, बस एक टुक अंधेरे में छत को निहारती रहती है।

कुछ दो चार जानने वालो के हर थोड़ी दी में फोन आ रहे है,

मन तो है उठा के कुछ गुफ्तगू कर लूं, पर शरीर सुन पड़ा है।

किसी ने घंटे भर पहले छू के कहा था, ये तो ठंडा पड़ने लगा है,

लगता है रूह ने ठिकाना बदल लिया है।


कुछ समय पहले ही मां की रोने की आवाज से आंखे खुली मेरी, बाबा भी नम आंखे लिए कमरे में कई बार आना जाना कर चुके है,

मेरे गले पे कुछ निशान है सब कह रहे है वो लाल दुपट्टा का रंग है,

अभी कुछ देर पहले ही तो वो दुपट्टा मैने गले में डाला था, पता नहीं।


अरे ये क्या मेरे ना होने में फ़र्क भी ना पड़ने वाले पुराने दोस्त रिश्तेदार सबका जमावड़ा लग रहे है, मौसा जी भाइयों के साथ एक सीढ़ी बनवा रहे है, पर ये थोड़ी अलग सीढ़ी है, हर बार से थोड़ी मोटी। अरे अब ये छोटू मटके पे रस्सी बांध उसमें कुछ धुआं सा रहा है।


मां अब भी खूब रो रही है, मैं बांटना चाहता हूं दर्द उसका पर इस बिस्तर से उठ नहीं पा रहा हूं।

पापा नाई के सामने बैठ बाल कटवा रहे है, दीदी भी रो रही है, दोस्तो की भी आँखें नम है पर वो हर कोशिश कर रहे है अपने आंसू छिपाने की। कोई बातें कर रहा है आज कल मानसिक दबाव कितना बढ़ गया है। वो कह रहे है कि उनके जमाने में ऐसा नहीं था।


कई लोग बार बार पंखे और लाल दुप्पटे की ओर बार बार इशारा कर रहे हैं। क्यों पता नहीं? अरे मुझे अभी याद ये तो वही दुप्पटा है जो हमने मां के लिए काशी से लिया था।

तुम्हे पता नहीं पर पिछली बार घर से आते आते मैं ये दुप्पटा ले आया था ताकि जब भी मन हो मां का स्पर्श मिल सके।

उसके मेरे आस पास ना होने का दर्द ना सताए।


मुझे उठा रहे है ६ - ८ लोग मिल कर कही ले जा रहे है, कुछ राम नाम जप रहे है।

पीछे ज्यादा भीड़ तो नहीं है, मां बेहोश सी हो चली है, पापा थके से नज़र आ रहे है। 

कुछ दो चार लोग इस को मेरा शव ओर मेरी शव यात्रा बोल रहे है।

मतलब ये नींद नहीं है, अब कोई दर्द नहीं, वो हार जाने की हताशा, जीत जाने की ख़ुशी किसी भी चीज़ का अब एहसास नहीं।


मतलब अब आजाद हूं मैं? पर मां? बाबा?

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