बनारस या काशी॥
यक़ीनन आपने बनारस घूमा है,
बाबा विश्वनाथ की आस्था से लबरेज़, गंगा आरती के आनंद से परिपूर्ण शहर,
जहाँ अक्सर एक ओर मशाने में जलती चिताये है, और एक ओर खिलखिलाती ज़िन्दिगियाँ।
घूमा होगा आपने वो बनारस जो आज एक कॉरिडोर बनके रह गया है।
यहाँ हर तड़के भीड़ आती है, बाबा के दर्शन करती है, गंगा में डुबकी लगाती है, कुछ देर भावुक होती है, शाम को लस्सी, भांग और पान के स्वाद चख़, अगली सुबह फिर तड़के नाव पे सवार कुछ तसवीरें खींचती है और फिर…
फिर बढ़ जाते है, अपनी रोज़मर्रा की भाग दौड़ में।
असल में अगर आप बनारस आये और यहाँ से लौटते वक़्त, अपने साथ काशी नहीं ले गए तो बुरा मत मनाइये पर आपने महादेव की नगरी को जिया नहीं।
जी हाँ, किसी भी शहर को जानने के लिए जरुरी है उसका इतिहास जानना,
पर “इ बनारस बा बाबू, एहिजा बस इतिहास जानलेला से कुछु ना होइ,” मतलब सिर्फ बनारस का इतिहास जान लेना उसे समझ लेना नहीं है, आपको वो इतिहास जीना पड़ेगा।
जीना पड़ेगा वो इतिहास एक अल्हड़, आवारा १७ साल के बालक के नज़र से जिसे बनारस में मोक्ष और काशी में स्वर्ग नज़र आता है,
आपको चलना होगा एक पथरीले रास्ते पे, जिसपे चलके कल का काशी का आज का बनारस (वाराणसी) बन गया।
यकीन मानिये काशी मंदिरो और गंगा घाटों से परे, अपने आप में एक आनंदमयी दुनिया बसाये हुए है,
बाबा विश्वनाथ, संकटमोचन हनुमान, और काल भैरव तो बस सिथरता प्रदान यंत्र है।
आप सोचिये की उस शहर का क्या अध्यात्म रहा होगा जहाँ एक चौराहे पे खड़े होकर आप अपने जीवन के चारो बुनियादी जरूरतों की और अग्रसर हो सकते है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
आपको चलना होगा एक लज़ीज़ सफर पे जिससे होते हुए काशी की मलियो लखनऊ पहुंच गयी,
उस सफर पे जहाँ से होते हुए एक पत्ते के टुकड़े ने सबके दिल पे ऐसी छाप छोड़ी की आज आपका भोजन बनारसी पान के बिना अधूरा है।
लखनऊ हमेशा से ही अदब का गढ़ रहा है पर। काशी में एक अल्हड़पन, एक बंजारापन है, ये अदबी-बेअदबी, आस्तिक-नास्तिक, धरम जात से परे सबको अपनाती है।
कई जंगो की मारी, ये मुई मरती ही नहीं।
मैने देखा है एक ओर बनारस, वो जो गंगा घाटों से अलग है, वो जो मशाने से दूर है।
एक काशी बाबा विश्वनाथ की ओर एक मजबूरियों की।
एक बनारस आस्था का और एक नाकामियों का।
सच झूठ से परे रोजमर्रा के विचारों और परेशानियों से जूझते इंसानों की काशी।
अघोरियों के मठ से चिलम की धुएं में उड़ती काशी।
एक कोठे पे हारती बचपनों वाली काशी।
साड़ी की चकाचौंध और मिठाई के मिठास के इतर, मजदूरी के पसीने के भीगती काशी।।
आप मथुरा, बरसाने, और बृज की होली खेल मुरलीवाले वाले के रंग में रंगे है,
कभी काशी में माशाने की राख के रंग में रंगिए।
महादेव में विलीन होते शून्य के सफर पे चलिए,
आदि से अनंतकाल तक का इतिहास जानिए।
तो अगली बार आप बनारस आये, तो इसकी गलियों को थोड़ा और जीने की कोशिश करियेगा, ये टमाटर की चाट से बहुत स्वादिष्ट ओर रोचक है।
ये थोड़ी चटपटी है बिलकुल कचोरी और हींग वाले आलू की तरह, थोड़ी मीठी है बाबा के भोग की तरह, थोड़ी शर्माती है एक नयी दुल्हन की तरह, तो कभी थोड़ा हट करती है एक शिशु की तरह।
काशी आपको एक ममता के आँचल का एहसास कराती है, और मौत से परे ये आपको मोक्ष के द्वार ले जाती है||
So deep bhai ❤️
ReplyDelete🙏
ReplyDeleteBeautiful ❤️
ReplyDeleteBeautifully Penned 👏
ReplyDeleteHar Har Mahadev 🙏
ReplyDeleteBeautiful ❤️
ReplyDeleteNicely done bhai
ReplyDeleteBeautiful thoughts converted into poetry..
ReplyDeleteBhut hi pyara❤️
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