प्रिये तुम ग़लत हो ||
मैंने देखा आज एक जोड़े को सड़क पे लड़ते हुए,
स्त्री किसी बात से खफा थी और पुरुष उसे बार बार अपनी ऊची आवाज़ में मानाने का प्रयास कर रहा था|
निरंतर व्यर्थ प्रयास के बाद, जब स्त्री नहीं मानी तो,
अचानक ही पुरुष ने स्त्री के पैर पकड़ लिए,
अब वो माफ़ी थी या ये जताने का तरीका कि तुम मेरी घर की बेड़ियों में बंधी हुई हो,
मुझे मालूम नहीं||
शायद बेड़िया ही रही होंगी, गर माफ़ी होती तो स्त्री अपने गुस्से को भाप बना कर अश्क़ो में नहीं बहाती,
वो जानती है कि ज़माना कितनी भी तरक्की कर ले, पुरुष हमेशा ही उसके पैरों में बेड़ियां बांधता रहेगा|
कहते है पुरुष अपनी पसंदीदा औरत के सामने बच्चों सी हट्ट करता है.,
मुमकिन है कि वही ज़िद स्त्री के पैरों की बेड़ियां बन जाती है|
क्या स्त्री का रिश्ते में दम घुटना स्वाभाविक नहीं है?
अगर हां तो,
उसका अपनी भावनाएं व्यक्त करना क्यों गलत समझा जाता है?
ये लाज़मी है की पुरुष अपनी अस्वीकृति ऊचे स्वर में जाहिर करता है,
चाहे वो स्त्री से हो या ज़माने से, पर उसकी अस्वीकृति की दूसरे ओर हर बार होती है एक स्त्री जो अपने अथक प्रयासों के बाद भी ये नहीं कह पाती की,
प्रिये तुम ग़लत हो||
तुम दो पहिये की गाड़ी में एक पहिया खींचने लगे हो.,
और ज़्यादा तनाव के कारण रिश्ते हो या धागे टूट जाते है|
पर क्या ये ज़माना इस टूटे हुए रिश्ते को पुरुष की नाकामयाबी से जोड़ के देख पाएगा?
या इसे इस्तेमाल करेगा स्त्री के दामन पे कोई लालछन लगाने में?
एक स्त्री को चाहिए कि उसका पुरुष साझेदारी करे, बस ज़िम्मेदारिया ना निभाए,
सात फेरो में से 4 फेरो में स्त्री पुरुष के आगे होती है,
वो वचन देती है कि चाहे कुछ भी हो जाए वो अपने पुरुष के आगे एक ढाल बने खड़े रहेगी,
पर तब क्या जब, पुरष उन सात फेरों के मायने भूल जाए?
स्त्री माँ है वो सब माफ़ कर देती है, पर जब एक पुरुष उससे मिलन करता है फिर वो उसे अपना ही एक अंश मानती है और चाहती है की चाहे जो हो जाए मेरा अंश मुझे चाहेगा, मानेगा, प्यार करेगा और रुठने पे मनाएगा||
पर उसे अकसर झेलना पड़ता है पुरष की पौरुषता, पुरुष की ख़ामोशी और उसका गुस्सा|
वो ये कह ही नहीं पाती कि प्रिये तुम गलत हो, और अगर कह पाती है तो
पुरुष फिर पैरो पे गिर के माफ़ी नहीं उसके पैरों में बंधी बेडियो का एहसास कराता है.,
वो रोता है और बताता है की देखो तुम ये बेड़िया मत खोलना, भले मैं कितना भी बुरा हूं पर बेडियो का सरताज़ हूँ, तो अगर तुम जाओगी तो कुछ टूटेगा, क्या?
पता नहीं शायद रिश्ता, शायद स्वाभिमान या शायद ज़माने में खोकली पुरुष की दोगली इज़्ज़त||
Absolutely true
ReplyDeleteVery touching 💕
ReplyDeleteThat's true ,,good thoughts ,,, Awesome writing 👏👏
ReplyDelete👌👌
ReplyDelete😍😍😍😍😍
ReplyDeleteWaoooo amazing 💙
ReplyDeleteWow! Loved it. Keep writing, you are great at it.
ReplyDelete👌🏻👌🏻
ReplyDelete❤️❤️
ReplyDeleteGood one, keep up the great work 👏
ReplyDeleteWow this is absolutely an eye opener. Great words 👏
ReplyDelete👏👏
ReplyDeleteYahi ek sachai hai... jo ankahi hai aur ehsas sabhi ko dilati hai hr pal... it's so nice words you said.😍
ReplyDeleteVery Beautiful Lines..👌🏼👌🏼
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteBeautiful Lines♥️
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