मेरी पेहली रसोई|
वक़्त दौर और जमाना सबका आता है 90’s सचिन का दौर था, तो पिछला दशक कोहली का,
और इंसान अक्सर खुद को किसी और के समय और दौर के साथ जोड़ फूले नहीं समाता है
पर लम्हे और पल तो उसके अपने होते है, जैसे पहला पे चेक, पहली किश, पहली मोहब्बत, और मेरा वो ख़ास पल है पहली बार खाना बनाना।
ये बात उन दिनों की है जब में कुछ १५-१६ साल का था, पेट पे थोड़ी थोड़ी चर्बी चढ़ने लगी थी जिसके लिए घर वाले रोज़ सुबह उठा के दौड़ने भेजते थे।
सुबह सुबह उठना अच्छा तो लगता था पर डर भी था की वो बगल वाले श्रीवास्तव अंकल का शेरू मेरे पीछे ना दौड़ पड़े, अच्छा जी बात ऐसी है की १५-१६ साल का लड़का सुबह बस ठंडी हवाओ में दौड़ने के लिए तो नहीं उठ सकता ना। और मेरे सुबह उठने का कारण थी, अदिति, हमारे पडोसी श्रीवास्तव अंकल के छोटे भाई की बेटी, जो दो साल भोपाल पे पढ़ने के लिए आई थी।
इक शाम पड़ोस के किचन से आती आवाजों को गौर से सुनने पे पता चला की उसको सूज़ी का हलवा बहुत पसंद है, तो बस हमने ठान ली की अब तो हलवा बनेगा और पड़ोस में जाएगा।
पर कैसे?
कभी किचन में गए नहीं, सूज़ी कैसी दिखती है को छोड़ कर कुछ पता नहीं, और माँ से पूछ नहीं सकते क्यूँकि उनसे झूठ नहीं बोलना और सच बोलके मार भी नहीं खानी। फिर सोचा बहन से पूछ लू पर माँ तक बात तो पहुंच ही जायेगी, तो किया क्या जाए?
जब ये बात दोस्तों के बीच पहुंची तो पता चला की ज़्यादा कुछ नहीं करना होता है,
सूजी मैं थोड़ा घी शक्कर और पानी डालके थोड़ी देर गैस पे पक्का लो और बन गया हलवा।
अगले दोपहर घर पे किसी को ना पाके मैंने गैस चालू की और जो जो सीखा और सुना था सब कुछ लागू करके एक कटोरी में हलवा लिए पहुंच गए पड़ोस में। मैंने वो हलवे का कटोरा श्रीवास्तव आंटी के हाथ में पकड़ाया, माँ ने भेजा है अदिति को पसंद है ना इसलिए बोलके वापस आगया।
शाम में करीब चार घंटे बाद, जब माँ घर आयी तो मुझे सीधे कमरे में बुलाके बोली की हलवे के लिए सबसे पहले सूजी को मद्धम आंच पे भूनना पड़ता है, किचन की तरफ इशारा करते हुए बोली, “चल आजा सिखाती हु”
मैं कुछ पूछता उससे पहले ही माँ बोल पड़ी “पड़ोस से आंटी का फ़ोन आया था, तूने बताया नहीं, तुझे अदिति के लिए हलवा बनाना था”?
मैं नज़रे झुका के बस यूँही किचन की चौखट पे जम सा गया था, माँ ने मुझे देखा और बोला वहां दूर से कैसे सीखेगा इधर आ,
आज माँ ने पहली बार मेरी गलती को वक़्त के सफ़ेद चादर तले दबाया नहीं था।
मैं बड़ी ध्यान से सूजी को कभी तेज तो कभी धीमी और फिर मद्धम आंच पे सिकते सिकते अपना रंग बदलते देख रहा था, फिर माँ ने शक्कर और इलाइची पाउडर को पानी के साथ घोला और फिर एक कढ़ाई में गरम घी में वो भुनी हुई सूजी को डाला थोड़ा और भुना। फिर वो शकर का पानी दाल के छोड़ दिया। पानी के गिरते ही एक छन्न की आवाज और कढ़ाई से उठते धुएं ने पुरे किचन को महका दिया था। कुछ लम्हों बाद कढ़ाई में बड बड करते सूजी उबलने लगी फिर माँ ने उसमे कुछ सूखे मेवे डाले और फिर जब तक पानी सुख ना गया तब तक उसको चलाती रही।
फिर मेरी तरफ देख माँ ने बोला “ले बन गया।”
मैं बस किचन छोड़ के जा ही रहा था की माँ कहा
“देख ज़िन्दगी इस हलवे की तरह होती है दिखने और सुनने में बहुत सरल पर जब आप परेशानियों के आंच पे जलते हो, तब आपको भी अपना रंग छोड़ दूजे रंग में ढालना पड़ता है। सालो की मेहनत हमे घी की तरह भूनती है, उस समय हम जिनके साथ रहते है वो हमे पानी की तरह राहत और हमारी ज़िन्दगी में मिश्री सी मिठास घोलता है। और आखिर में अच्छी क़िस्मत सूखे मेवे सी हमारे ज़िन्दगी को सवार देती है।
पर याद रखना सूखे मेवे ना हो फिर भी लोग हलवा खाते है, पर अगर परेशानियों से डर के मेहनत की आंच पे भूनोगे ही नहीं तो हलवा, हलवा तो नहीं होगा ना।”
१० साल होगये उस पल को गुज़रे हुए, आज अक्सर किचन में कुछ कुछ ना बनाता रहता हु, जिन्होंने खाना खाया है मेरे हाथ का वो कहते है की मेरे हाथ में भी मेरी माँ सा ही सवाद है। माँ भी अक्सर तारीफ कर देती है खाने की और कभी कभी नमक और मसालों का इस्तेमाल सिर्फ खाना ही नहीं ज़िन्दगी में भी सीखा देती है।
आज पीछे मुड़ जब उस हलवे को याद करता हु तो सीख तो याद आती है पर ये भी सोचता हु की उस रोज़ के बाद मैंने सुबह उठ के दौड़ना जाना छोड़ दिया था क्या अदिति मेरा इंतज़ार करती होगी, क्या उसने वो हलवा उतने ही चाव से खाया होगा जितने चाव से मैंने बनाया था, पर फिर वो एक पल ही तो था, जो गुज़र गया, बस मुस्कुरा के भूल सब भूल जाता हूँ।।
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