लौट आओ ना!!

सुनो, लौट आओ ना.,
थक गया हूँ मैं तुम्हारे जाने के कारण को अपनी 
कच्ची मोहब्बत के तमगे से छुपाते छुपाते ।

लौट आओ के जो अब ना आये तुम तो ये अब बस यूँही  ठहर जाऊँगा मैं.,
नहीं! नहीं!
फिर किसी और का होऊंगा अब मैं बस 
अब अपनी कच्ची मोहब्बत को सच्ची समझ यूं ही छोड़ दूंगा

अच्छा चलो माना की मेरा कसूर था.,
पर हमारा ये दस्तूर तो ना था।
और तेरी गलियों में रात-रात  भर जागना 
मेरा बस एक फितूर तो ना था॥

याद करो वो गंगा घाट पे बैठ हमने साथ छट करने की कसमें खायी थी.,
और हर सुबह तड़के हमने सुन-सान सड़को पे ना जाने कितने ग़ज़लें गायी थी॥

वो याद हैं तुम्हे जब मैं पहली बार तुम्हारे लिए  स्कूल के बागीचे से तोड़ गुलाब की कली ले आया था 
उस रोज़ तुमने कहा था 

"की अगर तुम गुलाब लातें तो मैं ना लेती 
गर तुम जेब में भर बहार भी ले आते तो भी मैं ना लेती 
पर पर तुम लाये भी तो एक कली आखिर इसको मन करू तो मैंने कैसे?"

तो बस उसी कली के खातिर लौट आओ ना।

अच्छा बताओ,
वो गुलाबी साडी आज भी पहनती हो ना तुम?
अपने घुंघराले बालो में पेंसिल लगा भूल जाती हो ना आज भी?

हां रख दी थी मैंने भी यादें तुम्हारी वो ऊपर की दराज़ में अपनी शर्ट की सिलवटो के साथ घडी कर के.,
पर इस जाड़े माँ ने उस दराज़ से पुराने कपडे क्या निकालें तुम्हारी यादें भी लौट आयी 
तो उन्ही यादों के लिए लौट आओ।

लौट आओ की तुम्हारी हाथ की काम शक्कर वाली खीर खाने का बहुत मन है.,
वो स्टेज पे चढ़ के पूरी महफ़िल के सामने तुम्हारे लिए शेर पढ़ने का बहुत मन है।

अरे लौट आओ के 
बिखर रहा हु मैं एक बड़े शहर में किसी छोटे शहर के सपने की तरह 
आके थाम लो ना तुम भी मुझे उस समन्दर की तरह जो हर शाम कितने ही सपनो को बिखरने से थाम लेता है॥

घूम गया हूँ मैं इन बड़े शहर की ज़द्दोज़हद में.,
तुम आके मुझे वो लखनऊ की शामो सा सुकून देदो ना॥

Comments

Post a Comment

Popular Posts