चांद पागल हैं

चांद पागल है.,
अरे हां सच्ची चांद पागल ही तो है
की नही देखना मुझे दृश्य तुम्हारा
पर फिर भी हर रात तुम्हारी खिड़की पे
ताका झाकी करता है।

अरे लिख के नाम तुम्हारा एक कोरे कागज़ पे क्या छोड़ा मैंने
हर रात तुम्हारी दरवाजे से तुम्हे झकता है,
फिर हर नारंगी शाम में मेरे साथ बैठ तुम्हारी गुफ्तगू किया करता है।

इक बार बताया उसने की कैसे तुम गुलाबी साड़ी ओढ़े शीशे में खुद को निहार रही थी., 
माथे पे एक हरे रंग की बारीक बिंदी
गले में एक मंगल सूत्र और 
बगल में खुले दराज से तुम्हारी एक तस्वीर चमक रही थी।

पर एक रोज एक अमावस्या से सब बदल दिया.,
तुमने खिड़की पे आना छोड़ दिया 
तुम्हारे दरवाज़े बंद हो गए और हमारी बातें।

मुझे समझ नहीं आया की आखिर क्यों चांद ने
ताका झाकी छोड़ 
बादलों से घिरे रहना शुरू कर दिया था
अब शामें नारंगी नहीं बल्कि गुलाबी हो चली थीं
मानो बादल भी किसी के जाने पे रो रहा हो।।

एक लिहाफ में पेश किए गए खत जैसे 
आज भी चांद कभी कभी झाक लेता है उस घर में की
तुम हो तो नही

पर अब शायद नही क्योंकि 
उस रात का वादा तुम भूल गई हो
मैं तैनू फिर मिलांगी की कसमें याद नहीं अब तुम्हे।

पर अब भी सुनहरी शाम में अपना एक अक्स अक्सर तलाशता हूं मैं., 
पर वो अक्स अब कहीं गुम सा गया है, कहीं खो गया है शायद।
अब बचा है तो सिर्फ ख्वाबों का एक पिटारा हो हर रात भरता तो है.,
पर फिर हर सुबह किसी सहरे की तरह खाली हो जाता है.,
और बची है ये किसी फास्ट लोकल की तरह भागती जिस्त,

पर सुनो चले आओ ना वापस और ये शहर की तंग सड़कों को वापस, काशी की पुरानी बेख़ौफ़ गलियां बना दो ना।
उस लाल चौक से चाय ले आना संग समन्दर किनारे बैठ सूरज को समन्दर की बाहों में सोता देखेंगे।

चले आओ की अब दिल नही करता उठने का
तो शायद अब अगली मिलेंगे तो
तुम सामने होंगी पर हम उठेंगे नहीं।।

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