किताबें या तुम।
एक सवाल जो अक्सर पूछती हो तुम की किताबें या तुम., तो सुनो की..,
श्वेत से रचित तुम, और शून्य में विलीन होती ये किताबें.,
इन किताबों के दर्पण से तुम और भी हसीन लगती हो।
तुम प्रिय हो पर प्रिय है क्या ये तो मुझे किताबों ने ही सिखाया है.,
इसलिए जब तुम पूछती हो किताब या तुम.,
तो मेरा जवाब अक्सर बस यही रहता है कि.,
किताबों में बसी तुम और तुम में बसी मेरी कहानियां।।
कहानियां, ख्वाहिशें, इल्म, ज़िक्र, चाहते, और तेरे सदके में झुक नमाज़ी हो जाऊं.,
बैठ मेहताब पे नाप लूं पूरी ज़मीन मैं,
अरे, तू रोज़ी तो दे मैं हर रोज़ बेरोजगारी बन जाऊ।
और,
तू जो खोले बाहें अपनी मैं तुझसे लिपट पूनम का चांद हो जाऊ.,
तू जो ले अंगड़ाइयां मैं बसंत की एक ठंडी ब्यार हो जाऊ।
तू भर के प्यार निगाहों में अपनी जो देख ले मुझे बस एक दफा.,
मैं डूबता तेरे इश्क़ के समंदर में तेरी उस एक नज़र से पार हो जाऊ।।
तू अमावस की रात में जलते किसी दिए की रोशनी सा है.,
मैं गुमनाम, गुमसुम, खामोश दिवाली के बाद के सन्नाटे सा।
पर फिर भी बस एक झलक से तेरी आज भी अक्सर मेरे घर आंगन में दिवाली होती है।
और तूने कहा था ना कि चांद पसंद है तुझे.,
तो अब रमज़ान की हर शाम छज्जे पे महज तेरे दीदार से हमारी इफ्तारी होती है।।
गर तेरा मिलना मुझसे तय होता महज एक मन्नत से यूं ही.,
तो हर एक चलती गाड़ी से नदियों में सिक्के हमने भी फैंके होते ।।
गर हो जाते तुम मेरे बस यूं ही किसी शराब की घूट जैसे.,
तो शहर के हर मयखानों में जाम हमने भी पीये होते ।।
राधा का इश्क़ हो या मीरा की मोहब्बत, कृष्ण की लीला हो या श्याम की शरारत,
जो तुम हो जाते श्याम से मेरे, तो रुक्मणि सा हम भी मगध में जन्मे होते।।
तेरे जानिब से तेरी खुशबू लिए जो चलती है हवाएं.,
ये ज़िक्र तुझसे मेरा भी करती होगी ना।
तेरे ख्याल से जो टूट बिखर गया हूं.,
ये टूट ख्वाबों की रातें तुझे याद आती होगी ना।
दरअसल दायरा बढ़ा लिया है तुमने आज कल नज़रों का अपनी.,
पर फिर भी एक बार ही सही ये कभी तो मुझ पे अटकती होगी ना।।
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ReplyDeleteWaah Prabhat bhaiya.....This is something extraordinary writing at this ordinary age.....keep this up n up, the sky is the only limit.
ReplyDeleteAre rey thank you so much for your kind words
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