मेरा इश्क़ लाल नहीं

अनजान हो तुम भावनाओ से मेरी, पर फिर भी मैं कहता रहता हूं.,
नहीं झलकता आइने में अक्स तुम्हारा, मैं फिर भी आइना निहारा करता हूं।
हम एक नहीं, हम साथ नहीं, सामने है पर हम पास नहीं.,
तुम नहीं आओगे चौखट पे मेरी मालूम है मुझे, मैं फिर भी हर शाम उसी चौखट पे तेरे इंतज़ार में बैठा रहता हूं।।

कैसे बताऊं क्यों चाहता हूं मैं तुम्हे.?
शब्दों से परे एक नज़्म लिखी है दिल लगा के सुनो तो सुनाई देगी तुम्हे।
तेरे सिरहाने बैठे तेरे घूंघराले बालों को सहलाना, तेरे सोलह श्रृंगार को निहारना चाहता हूं मैं., 
तेरे बगल तो खड़ा हो सकता हूं, पर तेरे सिरहाने बैठने का हक नहीं हमें।।

नहीं मेरा इश्क़ लाल नहीं, मैं शुद्ध श्वेत सा चाहता हूं तुझे.,
तेरे जिस्म की ख़ुशबू की भूख नहीं, तेरे आंखो में झलकता प्यार ही काफी है।
क्या झुकाऊं सजदे में मैं अपना सर उस खुदा के.,
तेरे अश्को से है होता वूजू, तो तेरी मुस्कुराहटों पे ये दिल नमाज़ी है।।

ठंड की ठिठुरन में मैंने पश्मीना सा ओढ़े रखा है तुझे.,
एक अनजानी दराज के किसी अनजाने कोने में मैंने राज सा छुपा रखा है तुझे।
तू पास है एहसास में, तू साथ है हर एक ख्वाब में., और
इन गलियारों से जो हवाएं गुजरती है मैं उन हवाओं में महसूस करता हूं तुझे।।

बुल्ला खेल बैठा बाज़ी एक इश्क़ की पी के संग.,
जो जीत गया तो पिया उसके.,
जो हार हुई तो बुल्ला पी के संग।।

जब डूबेगा सूरज पश्चिम के उस नारंगी आसमानों में.,
जब होगा फलक पर चांद उन चांदनी रातों में.,
जब धरा से मिलन को आकाश तड़प उठेगा.,
जब विरह के गीत सुन हर कोई चीख उठेगा.,
जब तड़प उठेगी घटाओं में, जब समंदर उबल उठेगा.,
जब सेहराओ में सुनामी उठेगी, जब मयखानों में अमृत बटेगा
जब तांडव से पुरा विश्व फिर दहल उठेगा.,
जब फूलों की कलियों को खुद काटे नोच खायेंगे., 
तब उस एक पल में हम फिर मिल जायेंगे।।

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