इंतज़ार

आखिरी बार पूनम का चाँद कब देखा था तुमने, 
आखिरी बार दूसरों के चेहरे पे कब खुशी बांटी थी तुमने।
तुम अक्सर खुद की ही बातों पे खुद ही रोलेते हो.,
पर आखिरी बार खुद के साथ बैठ खुद की बातों पे कब हँसा था तुमने।।

वो पुराने किताबों के कुछ पन्ने आज भी तुम्हारे दिए गए फूलों से महकते है.,
वो दरवाजे के देहलीज पे मैं आज भी अक्सर तुम्हारे खत या तुम्हारे आने के इंतजार में बैठ जाती हूं।
वो भीड़ में तुम्हारी आंखों से जो मेरी आंखें टकराके शर्मा जाती थी , मैं इन आंखों में आज भी वही शर्म ढूंढ़ती हूं., 
कहते कहते अक्सर जो तुम चुप चाप मुझे निहारने लगते थे मैं आज भी वही नज़र ढूंढ़ती हूं।
दिल तब भी तुम्हारी आहट से धड़क उठता था ये आज भी तुम्हारे आधे अधूरे ज़िक्र से मचल उठता है.,
ख्वाबों का परिंदा तुम्हे कहां उड़ा ले गया मुझे मालूम नहीं.,
पर फिर भी आज में तुम्हारे फूलों के खुशबू से महकते मेरी किताबों के पन्ने हर रोज़ तुम्हारी याद में महसूस करती हूं।।

एक ताबूत में बंद कर बैठे हो ज़िन्दगी अपनी, पर ताबूत में तो अक्सर लाशें होती है, 
रात भर जागने के बाद ही तो ख्वाहिशे सोती है। 
अरे करती है माँ दुआए हर रोज़ तेरी सलामती कि, 
पर तेरा ये हाल देख वो सलामती की दुआए भी रोती है।।

अंधेरा सा छाया है, इंतज़ार अब उजाले का है, 
ख्वाहिशो में गुम गए थे हम कही, इंतज़ार अब ज़िन्दगी में हमें वापस खींचती एक सुबह का है।
बेबस लाचार और दूसरों के सहारे जी थी हमने ज़िन्दगी , इंतज़ार अब कब्र तक पहुँचाने वाले चार कंधो का है, 
जीते जी जिए थे हम मुर्दो की तरह, अब इंतज़ार मौत के बाद ज़िन्दगी का है।। 

बेखौफ एक अनजानी सड़क पे भगो तो सही ,
ज़िन्दगी की परेशानियों को दूर रख एक रोज़ कभी मुस्कुराओ तो सही।
मुस्तक़बिल कामिल करने में क्या खूब मसरूफ हुए तुम्,
अरे भविष्य छोड़ एक बार आज में जी के दिखाओ तो सही।।  

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