Nazm

अज़ाब क्या है उनसे ना पूछना जिन्होंने तुम्हे देखा ही नहीं..,
अज़ाब तो तुम्हे वो बतलायेंगे जिनकी आँखो में अब भी तुम्हारा तसव्वुर है।।
चाँद आसमाँ में हो या धरती पे फर्क हमे तो पड़ता नहीं..,
क्योंकि जगह कोई भी हो अब्र महताब साथ-साथ यही तो दस्तूर है।।

यूं तो चेहरे और भी तहरीर थे नज़्मो में हमारी..,
पर वो नूर खुदा सा हमे एक ही में तो नज़र आता है।
गर चाहते हो तो कर लो नक़ाब-पोशी चेहरे की अपने..,
छुपा कितने भी बादलों के घूँघट में क्यों ना हो चाँद हमेशा चाँद ही नज़र आता है।।

नही हयात मेरी इतनी भी ख़ूबसूरत नही थी तुमसे पहले..,
पर अब तो यूं चंद पलों में ही जन्नत सा एहसास मिल जाता है।
यूं इज्तराब में जीना ही तो अक्सर बयान कर देता है राज़ न जाने कितने..,
अरे बिना तड़पे यूं ही थोड़े कोई मिर्ज़ा तो कोई राँझा बन जाता है ।।

लगायी थी अपने लकीरों की बोलिया एक मुसव्विर ने खरीदने उस चाँद को..,
उसे क्या पता दिलों के बाज़ार में भाव लफ्जों का आज भी लकीरों से ज्यादा है।
उस मुसव्विर से कह दो की मेरे चाँद को लकीरों में ना बांधे..,
मैं नज़्मो में अपनी उस की अंगडाईया खुद तहरीर करूँगा।।

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