औरत का हाल

उन दीवारों पे आज फिर खून के निशान  हैं..,
यहाँ हर आदमी आज फिर नज़रे झुकाये शरमशार है।

उसका कसूर क्या था की वो खुबसुरत थी..,
यहाँ हर आदमी के नजर मे तो बस हवस थी।

मिलाई जब उसकी इज्ज़त माटी मे हासिल तुमको क्या हो गया..,
भुलते-भुलते इस घटना को उसने अपनो का दामन भी खो दीया

यहाँ क्यों नारी को अबला मान उसको नोचा और रोंदा जाता है..,
भला कौन अपनी मरदानगी एसे दिखाता हैं।

उसने तो उसके कोमल शरीर को कुचला था अपनी लातों से..,,
पर इस जमाने ने भी तो मारा था उसके जमीर को अपनी बाते से।

आँसू जैसे सूख गये उसकी आँखों के और दिल भी पत्थर हो गया..,
ये मोमबत्तियां लेके चार दिन निकलने वाला आम आदमी फिर से सड़कों पे निकल गया।

समझ ही नहीं आता ये कैसी भूख बनाई हैं..,
यहाँ  भूख के नाम पर मरदों ने अपनी हवस मिटाई हैं

रोता होगा खुदा भी ये घिनौनी करतुतो को देख कर..,
पर क्या रो भी पाती होगी वो नारी ये सब सह कर॥

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