लिखता हूँ मैं

लिखता तो अपनी ही कहानी हुँ मै , पर पता नहीं क्यों सबको उसमे तु नज़र आती है.,
लिखता तो अपने ही सफर के बारे ये हुँ , पर फिर भी उसमे लोगों को तुझ तक जाती एक सड़क नज़र आती है।
पर खता ये लोगों की भी नहीं
क्योंकि लिखता तो मैं अपनी ख्वाहिशे ही  हूँ, पर ये मुझ से शुरू हो तुझ तक जाती है॥

लिखता तो मैं अपना फलसफा ही हूँ , पर फिर भी उसमे सबको तेरा अक्स नज़र आता है
लिखता तो मैं अपने ख्वाब ही हूँ , पर फिर भी इन्हें उसमे तेरा साया नज़र आता है।
पर ये गलती लोगों की भी नहीं..,
क्योंकि लिखता तो मैं अपनी हकीकत ही हूँ  पर मेरे वजूद मे भी तु ही नज़र आता है॥

लिखता तो मैं अपनी ही चाहते हूँ , पर लोगों को उसमे भी  तेरी खूबसूरती ही नज़र आती है..,
लिखता तो मैं अपनी कोशिशे हूँ, पर उसमे लोगों को तेरी खताएं नज़र आती है।
पर ये जो खताएं हैं लोगों की वाजिब है..,
क्योंकि मैं लिखता तो वही हूँ जो तेरे नज़रों की साजिशे मुझसे कह जाति है।

लिखता तो मैं अपनी मुस्कान ही हूँ , फिर भी लोग उसमे मेरे आँसू ढूंढ लेते है..,
लिखता तो मैं अपनी कल्पनाएँ हूँ , फिर भी लोग उसमे हकीकत ढूंढ लेते है।
इस कशमकश मे हूँ की मैं यहाँ हूँ भी या नहीं..,
क्योंकि लिखता तो में खुद को ही हूँ , फिर भी लोग उसमे तुझे ढूँढ लेते है

Comments

Popular Posts