गुरु तुम ही श्रेष्ट हो
आप मेरा सहारा थे जब कोई मंजिले कोई राहे नही थी..,
आप तब भी मेरे साथ चले थे जब मेरे आवाज की कोई अहमियत नही थी।
बिखर सा जाता इस जीवन में मैं अगर आप ना मिलते मेरे गुरु..,
क्यूंकि आप तो तब भी साथ थे जब मेरे जबान में आवाज तक नही थी।।
ज़िक्र मेरा ही होगा मेरी हर एक कामयाबी पर..,
तारीफे भी मेरी ही होगी मेरी हासिल हर मंजिल पर ।
पर शुक्रिया अता करू तो केसे मेरे गुरु..,
क्यूंकि हासिल की मैंने मंजिल मगर , चला तो हूँ आप ही के पद चिन्हो पर।।
ये शरीर जरुर मेरा हे पर परछाई आपकी है..,
इन उचाईयों का गुरूर मेरा हे पर उड़ान की चाहत तो आपकी है।
आज यही कह सकता हूँ सर झुका कर मैं आपसे..,
की जिन मंजिलो का अभिमान मुझे है, उन मंजिलो की बनी बनाई राहे आपकी है।।
समाऊंगा जब भी मैं इन वादियों में मेरा अभिमान और आपकी शिक्षा यही रह जायेगी..,
लहराऊंगा जब भी अपनी विजय पताका मैं , आपकी मेहनते जीत जायेंगी।
आज करता हु मैं यह वादा आप लोगो से..,
चाहे हांसिल करलु जो कुछ भी में , मेरी सारी मंजिले आप ही के नाम से जानी जायेंगी।।
Respect to all teacher
ReplyDeleteGood attempt to poetry