मेरी निशानियाँ

कैसे भूल जाऊ ए-ज़िन्दगी की तेरी बाहों में मैंने अपना बचपन जिया है..,
कैसे चला जाऊ मौत की गोद में मैं जब मैंने फिर बचपन का दामन थामा है।।
आज फिर ढूंढ रहा हूँ मैं वो निशान जो कही खो गए है...,
पर कैसे लाऊ वो निशान मैं वापस जो वक़्त के साथ वक़्त की तरह की घूम गये है।।

आज फिर वो टूटे रेट के घर मुझे तेरी याद दिला गये..,
वो कहानियों की किताबो से निकलती धुल मुझे फिर कुछ सुना गये।।
अक्सर बीते लम्हों के साथ निशानी भुला दी जाती है..
पर आज वही बीते लम्हे मुझे निशानियों की अहमियत समझा गये।।

चल आज वो आँख-मिचोली का खेल फिर खेलते है..,
चल आज नंगे पाँव फिर पेड़ पे चढ़ते है।।
जाने कहाँ चुप गये है सारे अपने अभी..,
चल वो लुका-छुपी की तरह उन्हें फिर ढूंढते है।।

रह गया था कुछ पीछे अपनों से कामयाबी की दौड़ में...,
या आगया हूँ बहुत आगे अकेले दौड़ते-दौड़ते मैं।।
उठा रहा हूँ बॊझ अपनी ही ख्वाहिशो का मैं..,
पर अब थक गया हूँ अपने ही स्वार्थ की बेडिया तोड़ते-तोड़ते मैं।।

ना जाने क्यूं अब सब जरुरी सा लगता है..,
रुक गया हूँ मैं मेरा ज़मीर कुछ थका-थका सा लगता है।।
अब बस चलना चाहता हूँ वक़्त का हाथ पकड़ कर वापस पीछे मैं..,
क्यूंकि ना जाने क्यूं पूरानी सड़क का हर एक मोड़ मुझे एक निशानी सा लगता है।।

अब बस जा रहा हूँ मौत की गोद में सोने मैं,मेरी निशानियो को सम्भाले रखना..,
रह जाऊँगा उसी के आँचल में लिपट के मैं, मेरी निशानियो को हर राह मैं सजाये रखना।।
यूँ तो अक्सर खूबसूरत मौत अंत होती है ज़िन्दगी की..,
पर मेरी मौत के बाद ही तो जिंदा होंगी मेरी निशानियाँ , इन्हें हमेशा अपने दिल में बसाए रखना।।

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