कुछ इस कदर
इन्तेजार तो तेरा उन राहो पे अब भी है..,
जिन राहो पे हम हाथ थामे साथ चले थे।
इन्तेजार तो तुम्हार उन किनारों पे भी है..,
जिन किनारों पे बैठे हमने फलक के पार घर बनाये थे।
बता नही सकता कोई मेरी इन्तेजार की हदे यहाँ..,
क्यूंकि इन्तेजार तो तेरा इन रातो में अब भी है..,
जहाँ हम चाँद तले बैठे अपने आसमानों के सितारे गिनते थे।।
समाया तो मैं अब भी हूँ तुझमें कुछ इस क़दर...,
जैसे समाया होता है चाँद हमेशा चांदनी में।
समाया तो तू भी है मुझमे कुछ इस क़दर..,
जैसे समाया होता है इन्तेजार प्यार में।
ज़िक्र तो होगा ही हमेशा मेरा और तुम्हारा इन राहो पे अक्सर...,
क्यूंकि हम समाये हुए है एक दुसरे में कुछ इस क़दर..,
जैसे समाई होती है धरती आकाश के बाहों में।।
ज़िक्र होगा मेरा तेरी तनहा रातो में कुछ इस क़दर..,
जैसे ज़िक्र होता है डूबे सूरज का तनहा शामो में।
ख्वाहिशे तेरी हदे तोड़ेंगी कुछ इस क़दर ..,
जैसे हदे तोड़ देते है आँखों के आसूँ किसिके इन्तेजार में।
यहाँ ख्वाबो में ही सही..,
पर चाहते तेरी मुझे चाहेंगी कुछ इस क़दर..,
जेसे चाहती है ख्वाहिशे ख्वाबो को इस जहाँ में।।
आ तुझे ओढ़लू में कुछ इस क़दर फिरसे..,
जैसे ओढ़े हुए है चाँद चांदनी को फलक पे।
आ छुलू मैं कुछ इस क़दर तुझे फिरसे..,
जैसे छूती है ओश की बूंदे पत्तो को हर रोज पहले पहर में।
कुछ ख्वाहिशे ही मेरी अलग सी है इसीलिए
आ तुझे रखलू कुछ इस क़दर में फिरसे..,
जैसे रख लेती है सीमाए समन्दरो को बाँध के।।
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