औरत की लड़ाई

उंगलिया तो सीता माँ पे भी उठायी थी इस पुरे संसार ने...,
उछाली तो इज्जत द्रौपदी की भी इस जहां ने भरीं महफ़िल में..,
थी तो वो भी औरत ही जिसके चेहरे को जलाया था अपने पागलपन में..,
और थी वो भी औरत ही जिसको मारा था सरे आम सड़को पे अपने लालच में।।

सो जाता है जब ये पूरा जहाँ , तब भी उसकी आँखों में घर की चिंता होती है...,
ठहर जाते है जब ये पल सारे , तब भी उसकी यादो में बच्चों की फ्रिक होती है।
सवाल उठाये जाते है उस औरत की आबरू पे...,
पर जब लेती है आखरी साँस भी वो , तब भी उसकी आँखों में संसार का डर और मन में कितनी बेचनी होती है।।

समां गया था ये पूरा संसार नारी के कदमो में...,
जब एक नारी पार्वती से दुर्गा बनी थी।।
गिरा तब भी था ये जहाँ नारी के कदमो में..,
जब एक नारी माँ के रूप में जन्मी थी।।
बिखर तो आज भी जाएगा ये सारा जहाँ नारी के कदमो में..,
क्यूंकि पहले भी नारी माँ नही काली के रूप में जन्मी थी।।

ये रीति रिवाजो की बेड़िया अब मेरी उड़ाने नही रोक सकती..,
ये जामने की कुछ बातें अब मेरा हौसला नही तोड़ सकते।
ज़िक्र होगा ही मेरा इस ज़माने में हर रोज..,
क्यूंकि यह ये लड़ाई है जो में गिर कर भी नही छोड़ सकती।।

मैं ये उड़ने की चाहत कैसे छोड़ दू..,
जब उड़ने का हुनर मैं सीख के आई हूँ ।।
मैं इन राहो पे चलना क्यूँ छोड़ दू..,
जब मैं मंजिल तक पहुचने का हुनर लेके आई हूँ।।
मैं तो लड़ी थी अपनी ही किस्मत से पैदा होने के लिए भी..,
फिर कैसे अपने साम्मान की लड़ाई बीच में छोड़ दू..,
जब मैं जीतने की काबिलियत जीत कर आई हूँ।।

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